इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ACP की सैलरी से कटेगा ₹2 लाख मुआवजा, शांतिभंग के मामले में अवैध हिरासत पर सख्त रुख !

​उत्तर प्रदेश : प्रयागराज

18 जून 2026 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberty) और पुलिसिया मनमानी को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने शांतिभंग (Section 151 CrPC/BNSS) के एक मामले में एक व्यक्ति को 8 दिनों तक अवैध तरीके से जेल में रखने पर उत्तर प्रदेश सरकार को ₹2 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि मुआवजे की यह राशि पीड़ित को प्रताड़ित करने वाले प्रयागराज के ACP वेदप्रकाश मिश्रा (वेदव्यास मिश्रा) के वेतन से वसूली जाएगी।

​क्या है पूरा मामला:-

यह मामला प्रयागराज के मंसूर अहमद नामक व्यक्ति से जुड़ा है। पुलिस ने उनके खिलाफ शांतिभंग की आशंका के तहत कार्रवाई की थी। कानून के मुताबिक, ऐसे मामलों में आरोपी को पर्सनल बॉन्ड (व्यक्तिगत मुचलका) भरकर रिहा होने का अधिकार होता है। लेकिन, प्रयागराज के एसीपी (असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस) ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए मंसूर अहमद को जमानत या पर्सनल बॉन्ड का उचित अवसर दिए बिना ही 8 दिनों तक न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया। पीड़ित ने इस अवैध हिरासत के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

​हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और दिशा-निर्देश:-

न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी और न्यायमूर्ति गजेंद्र कुमार की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा, निजी स्वतंत्रता सर्वोपरि: किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से इस तरह खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। शांतिभंग के मामलों में जेल भेजना अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहली फुर्सत का काम। पर्सनल बॉन्ड का अधिकार: केवल शांतिभंग की आशंका होने पर व्यक्ति को सबसे पहले पर्सनल बॉन्ड भरने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। गैर-जरूरी तौर पर जेल भेजने (न्यायिक हिरासत) की प्रवृत्ति से अधिकारियों को बचना होगा। अधिकारियों की जेब से कटेगा हर्जाना: कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि अगर अधिकारी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करेंगे, तो उसकी कीमत राज्य की तिजोरी से नहीं, बल्कि खुद अधिकारी की जेब से वसूली जाएगी। इसीलिए ACP के वेतन से ₹2 लाख काटने का आदेश दिया गया।

​भविष्य के लिए तय हुआ नया नियम (गाइडलाइन):-

​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फैसले के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए एक बेहद सख्त गाइडलाइन भी तय कर दी है, नया नियम: अगर भविष्य में शांतिभंग या ऐसे ही छोटे मामलों में किसी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा समय तक गैर-जरूरी या अवैध तरीके से न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उसे ₹25,000 प्रति दिन के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा।

​इस फैसले का महत्व:-

​कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यह फैसला यूपी पुलिस और मजिस्ट्रेट पावर का इस्तेमाल करने वाले पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों (ACP/DCP) के लिए एक बड़ा सबक है। अक्सर देखने में आता है कि धारा 151 के तहत पुलिस मामूली विवादों में भी लोगों को जेल भेज देती है। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब अधिकारी किसी को भी अवैध रूप से हिरासत में रखने से पहले सौ बार सोचेंगे।

उत्तर प्रदेश न्यूज़ हैड कृष्ण कुमार गुप्ता की रिपोर्ट

 

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