उत्तर प्रदेश : गोरखपुर
18 अगस्त 2026 : यह सिर्फ एक सड़क हादसे की कहानी नहीं, बल्कि उस बेबसी की दास्तान है, जिसमें एक पिता अपनी 11 वर्षीय बेटी की जिंदगी बचाने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा चुका है। 2 अगस्त को खजनी थाना क्षेत्र के उनवल गांव में शरीयत अली की 11 वर्षीय बेटी आबिदा सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गई। परिजन उसे जिला अस्पताल गोरखपुर लेकर पहुंचे, जहां से बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। मेडिकल कॉलेज में करीब एक दिन इलाज के बाद बच्ची को गोरखपुर के ट्रांसपोर्ट नगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। तब से मासूम का इलाज चल रहा है। बेटी की जिंदगी बचाने के लिए शरीयत अली अब तक दो लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुके हैं। जमा पूंजी खत्म हो गई और रिश्तेदारों व परिचितों ने भी अब कर्ज देने से हाथ खड़े कर दिए। हालात यह हैं कि परिवार के पास खाने तक के पैसे नहीं हैं और शरीयत अली के मुताबिक दो दिन से उन्होंने खाना नहीं खाया है। एक तरफ अस्पताल का बढ़ता बिल है, दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी के लिए संघर्ष करती मासूम बेटी। सबसे बड़ा सवाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी है। शरीयत अली के पास सरकार द्वारा जारी आयुष्मान कार्ड है, लेकिन उनका आरोप है कि ट्रांसपोर्ट नगर स्थित निजी अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनके अस्पताल में इस योजना का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में सवाल उठता है कि पात्र गरीब परिवारों को आयुष्मान योजना का लाभ दिलाने और योजना से जुड़े अस्पतालों की निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? हादसे के मामले में भी परिवार को पुलिस कार्रवाई के लिए भटकना पड़ा। शरीयत अली का कहना है कि खजनी पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया था। इसके बाद उन्होंने एसएसपी डॉ. कौस्तुभ से मुलाकात की। एसएसपी ने नाराजगी जताते हुए मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए। यानी बेटी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ती रही और पिता इलाज के साथ-साथ न्याय के लिए भी दर-दर भटकता रहा। शरीयत अली के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन ने उनकी मोटरसाइकिल भी अपने कब्जे में ले ली है और पैसे लेकर आने को कहा जा रहा है। एक गरीब पिता के सामने अब सवाल सिर्फ इलाज का नहीं, बल्कि बेटी की जिंदगी, न्याय और परिवार को दो वक्त की रोटी देने का है। यह मामला अस्पताल की संवेदनशीलता, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी और गरीबों के लिए संचालित सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या गरीब मरीज का आयुष्मान कार्ड सिर्फ कार्ड बनकर रह जाएगा? क्या इलाज के लिए परिवार को कर्ज, भूख और बेबसी के हवाले कर दिया जाएगा? जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को तत्काल मामले का संज्ञान लेकर बच्ची के इलाज, आयुष्मान कार्ड और अस्पताल की भूमिका की जांच करानी चाहिए तथा परिवार को हरसंभव मदद उपलब्ध करानी चाहिए। क्योंकि अस्पताल के बिस्तर पर सिर्फ एक मरीज नहीं, एक 11 साल की बच्ची की जिंदगी दांव पर लगी है।
तहसील ब्यूरो चीफ कैम्पियरगंज दुष्यंत लाल श्रीवास्तव की रिपोर्ट


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